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baikunth chaturdashi: तो ऐसे होती है बैकुंठ चतुर्थी पर शिव और विष्णु की पूजा

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त्योहारों के इस देश में आए दिन कोई-न-कोई त्योहार आता ही रहता है। ऐसे में कृष्ण माह की शुक्ल पक्ष को आने वाली चतुर्थी को बैकुंठ चतुर्थी कहते हैं। श्रद्धालु इस दिन को भगवान शिव तथा विष्णु की पूजा करके मनाते है। तो चलिए, Baikunth chaturdashi बैकुंठ चतुर्थी के बारे में विस्तार से जानते हैं:

Baikunth chaturdashi बैकुंठ चतुर्थी को लेकर मान्यता

श्रद्धालु इस दिन को व्रत रखकर मनाते है। इस दिन को भगवान शिव और विष्णु की पूजा करने के अलावा व्रत का पारण भी किया जाता है।

श्रद्धालुजन इस व्रत को बैकुंठ चौदस के नाम से जाना भी जाना जाता है।

भगवान विष्णु ने बैकुंठ चतुर्थी के बारे में क्या बताया

जब नारद जी द्वारा भगवान विष्णु से सरल भक्ति और मुक्ति का मार्ग पूछते हैं।

तब विष्णु भगवान बताते हैं, कि जो कार्तिक पक्ष के चतुर्थी को जो इस व्रत का पालन करता है। तथा श्रद्धा भक्ति से जो मेरी पूजा करते हैं।

उनके लिए मैं स्वर्ग के धार खोल जाते हैं। भगवान श्रीहरि ईश्वर के द्वार खोले का आदेश देते हैं।

जो भी भक्ति इस दिन पूजा करता है। उसे बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है।

क्या है बैकुंठ चतुर्थी का महत्व

कार्तिक शुक्ल चतुर्थी का यह baikunth chaturdashi दिन भगवान शिव और विष्णु के एकय होने का प्रतीक है।

प्राचीन काल की माने तो एक बार भगवान विष्णु काशी के महादेव को 1000 स्वर्ण कमल पुष्प चढ़ाने का संकल्प लेते हैं।

लेकिन जब स्वर्ण खुश चढ़ाने का समय आता है। तो भगवान शिव विष्णो जी की परीक्षा लेने के लिए एक स्वर्ण पुष्प खम कर देते हैं।

पुष्प कम हो जाने के कारण भगवान विष्णु अपने कमल नयन नाम और कुंडी काक्ष नाम को स्मरण करके अपने नैत्र को चढ़ाने के लिए तैयार हो जाते हैं।

ऐसा देख भगवान शिव एकाएक प्रकट होते हैं। और विष्णो जी का हाथ पकड़ लेते हैं।

भगवान शिव कहते हैं कि तुम्हारे स्वरुप वाली कृष्ण शुक्ल पक्ष की इस चतुर्थी को बैकुंठ चौदस के नाम से भी जाना जाएगा।

विष्णु जी को सुदर्शन चक्र कब मिला

भगवान महादेव इसी दिन विष्णो जी को करोड़ों सूर्य की कांति वाला सुदर्शन चक्र प्रदान करते हैं।

बताया जाता है इसकी चतुर्थी को स्वर्ग के द्वार खुले रहते हैं।

क्या है बैकुंठ चतुर्थी व्रत की कथा

बैकुंठ चतुर्थी baikunth chaturdashi की प्राचीन कथा कुछ इस प्रकार है कि एक बार नारद जी पृथ्वी लोक से भ्रमण करते हुए बैकुंठ धाम भगवान विष्णु के पास पहुंचे।

भगवान विष्णु द्वारा नारद जी को देख बेहद प्रसन्न हुए। और उन्हें आदर पूर्वक बिठाकर आने का कारण पूछा गया।

देव ऋषि नारद जी द्वारा बताया गया कि हे प्रभु!

आपका नाम जपकर आपके चहेते भक्त भी तर जाते हैं।

लेकिन जो सामान्य नर नारी होते हैं। वह आपके प्रेम से वंचित हैं।

इसलिए आप अपने सामान्य नर नारी के लिए कुछ ऐसा उपाय बताएं कि वह भी आपकी भक्ति कर मुक्ति को प्राप्त कर सकें।

संसार जगत के उद्धार के लिए कुछ ऐसा मार्ग बताएं।

ताकि कलयुग में भी लोग मुक्ति को प्राप्त कर सकें।

यह सुनकर भगवान विष्णु बोले हे नारद!

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन, जो नर नारी बैकुंठ चतुर्थी के व्रत का पालन करेंगे।

तथा श्रद्धा पूर्वक भक्ति से मेरी पूजा करेंगे। उनके लिए मैं स्वर्ग के द्वार खोले रहेंगे।

कुछ ही समय बाद भगवान विष्णु जय और विजय को बुलाते हैं।

वे उनसे कहते हैं, कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन स्वर्ग के द्वार खुले रखने का आदेश देते हैं।

भगवान विष्णु यह भी कहते हैं। कि इस दिन मेरे भक्त मेरा नाम लेकर थोड़ा सा पूजन करेंगे।

वह बैकुंठ धाम की प्राप्ति करेंगे।

शास्त्रों में बताया गया है कि इस दिन भगवान शिव और विष्णु की पूजा साथ में करना चाहिए।

अन्यथा भगवान विष्णु पूजा को स्वीकार नहीं करते।

कैसे मनाए बैकुंठ चतुर्थी

भगवान शिव और विष्णु की पूजा का यह दिन आप बेहद ही सरल तरीके से बना सकते हैं। इसके लिए आपको स्नान आदि से निवृत्त होकर के भगवान शिव और विष्णु के मंदिर जाना चाहिए। इसके अलावा आप अपने कुल देवी देवताओं के मंदिर भी जा सकते हैं। आपके आसपास किसी भी नदी या सरोवर में आटे या मिट्टी के 14 दिए जरूर जलाएं। यदि आपके आसपास कोई नदी या सरोवर नहीं है। तो आप अपने नजदीकी मंदिर में जाकर 14 दीपको को जलाकर भी भगवान शिव और विष्णु से कामना कर सकते हैं। दीप को प्रज्वलित करने के बाद आप अपने मन में नकारात्मक या किसी के प्रति द्वेश की भावनाओं का त्याग करें।

दीप प्रज्वलित करते समय यह ध्यान रखें

दिये हल्दी मैं अक्षत यानी साबू चावल को मिलाकर जमीन पर बिछादे। उसके बाद इन 14 दीयों को प्रज्वलित कर सकते हैं। सुबह-सुबह अपने घर परिवार के बड़े जनों का हाथ लगाकर गाय की सेवा करें। भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए। आप गाय को चारा भोजन इत्यादि भी खिला सकते हैं। अतिरिक्त प्रभाव कारी तो यह भी है, कि आप गौशाला में जाकर के थोड़ा श्रमदान करें।

बैकुंठ चौदस के दिन दीपदान करने का महत्व

ज्योतिषाचार्य के अनुसार बैकुंठ चतुर्थी के दिन दीपदान करने से आपको काफी फायदे हो सकते हैं। जो कुछ इस प्रकार है:

  • दीपदान करने से पूरे साल भर आपकी नकारात्मक ग्रह भी शांत रहेंगे।
  •  अगर नकारात्मक ग्रहों से आपको शारीरिक बीमारियां होती रहती है। इससे भी आपकी सुरक्षा हो पाएगी।

किस प्रकार के दीपक को दान कर होगा बैकुंठ चौदस में फायदा
दीपदान करने के लिए ज्योतिषाचार्य बताते हैं। कि आप स्टील पीतल या श्रद्धा अनुसार चांदी का दीपक भी दान कर सकते हैं।लेकिन दीपदान करते समय अवश्य ध्यान रखें कि दिये 14 ही होने चाहिए।

भगवान विष्णु और शिव की बैकुंठ चतुर्दशी पूजा विधि

इस baikunth chaturdashi बैकुंठ चौदस के दिन घर के उत्तर पूर्व दिशा में हरा कपड़ा बिछाकर उस पर कांसे के लोटे मैं जल, दूध, सिक्के, दूर्वा, सुपारी, पीपल के पत्ते पर नारियल रखकर हरिहर कलश की स्थापना करें। इसके साथ भगवान शिव और विष्णु का चित्र भी लगाएं।
कांसे से के दीए में गाय के घी का दिया जलाएं।

  • चंदन की धूप करें।
  • भगवान विष्णु पर गोलोचन और महेश्वर पर चंदन का तिलक लगाएं।
  • कमल का फूल भी चढ़ाएं।
  • इस दिन मखाने की खीर का भोग भी लगाये।
  • जल, इत्र, शक्कर और दही से अभिषेक करें।
  • इस दिन विशेष मंत्रों का एक-एक बार जाप करें।
  • बाद में भोग गाय को खिला दें।

इस व्रत में पूजा का मुहूर्त सुबह और शाम के समय होता है। आप अपनी सुविधा पूर्वक पूजा कर सकते हैं।

पूजन मंत्र बैकुंठ चतुर्दशी baikunth chaturdashi के लिए

हरिहर भगवान की पूजन का मंत्र
ह्रि हरिहर नमः।।

शिव भगवान की पूजा का मंत्र

ह्री ॐ हरिणाक्षय नमः शिवाय।।

भगवान विष्णु पूजन मंत्र

ॐ पद्मानाभाय नमः।।

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