Govardhan puja इसलिए दिवाली के एक दिन बाद मनाई जाती है

Govardhan puja इसलिए दिवाली के एक दिन बाद मनाई जाती है

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दिवाली हिन्दू धर्म का बहुत बड़ा त्यौहार है और दिवाली के ठीक अगले दिन Govardhan puja की जाती है। यह पूजा हर साल कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को की जाती है। इतना ही नहीं इसी दिन बलि पूजा, अन्नकूट, मार्गपाली आदी उत्सव भी मनाएं जाते हैं।

यह दिन उत्तर भारत से लेकर साउथ इंडिया तक बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। यही वह खास दिन है जब गोधन अर्थात गाय को पूजा जाता है। हिन्दू धर्म के अनुसार गाय देवी लक्ष्मी का स्वरूप है। जिस प्रकार माता लक्ष्मी सुख-समृध्दि प्रदान करती है ठीक उसी तरह से गौमाता भी हमें स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती है।

आज हम आपसे इसी पर्व के बारे में चर्चा करने वाले हैं जहां पर हम इस त्यौहार के महत्व और इसे मनाने की विधि के बारे में विस्तार से जानेंगे।

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क्यों की जाती है गोवर्धन पूजा

Why Govardhan puja is done
Why Govardhan puja is done

गोवर्धन पूजा आज से नहीं बल्कि प्राचीन समय से मनाते हुए आ रहे हैं।

इसे मनाने को लेकर एक कथा भी प्रचलित है। जिसके अनुसार एक बार भगवान कृष्ण,

गोपियों के साथ गायें चराते हुए गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुंचे।

वहां उन्होने देखा की हजारों गोपियों गोवर्धन पर्वत के पास छप्पन प्रकार के भोजन,

रखकर बड़े उत्साह से नाच गाना कर रही हैं। जब श्री कृष्ण ने इसके बारे में पूछा,

तो उन्होने बताया की मेघों के स्वामी इन्द्र को प्रसन्न रखने के लिए हर साल यह उत्सव मनाया जाता है।

तब कृष्ण जी बोलते हैं कि यदि देवता प्रत्यक्ष आकर भोग लगाएं तब ही तो,

इस उत्सव की कीमत है वरना तो यह सब व्यर्थ है। तब गोपियों ने बोला कि

यह इन्द्र जी का अपमान है जबकि वर्षा उन्ही की ही वजह से होती है।

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कृष्ण जी ने गोपियों को दिया जवाब

Krishna ji gave answer to gopis
Krishna ji gave answer to gopis

वर्षा तो गोवर्धन पर्वत के कारण होती है, हमें इन्द्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए।

सभी गोप−ग्वाल अपने−अपने घरों से पकवान ला−लाकर श्रीकृष्ण की बताई विधि से गोवर्धन की पूजा करने लगे।

इन्द्र को जब पता चला कि इस वर्ष मेरी पूजा न होकर Govardhan puja की जा रही है,

तो वह कुपित हुए और मेघों को आज्ञा दी कि गोकुल में जाकर इतना पानी बरसायें कि वहां पर प्रलय का दृश्य उत्पन्न हो जाये।

कृष्ण जी ने बचाई ब्रजवासियों की जान

Krishna Ji saved the lives of Brajwasi
Krishna Ji saved the lives of Brajwasi

मेघ इन्द्र की आज्ञा से मूसलाधार वर्षा करने लगे। श्रीकृष्ण ने सब गोप−गोपियों को आदेश दिया

कि सब अपने−अपने गायों बछड़ों को लेकर गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुंच जाएं।

गोवर्धन ही मेघों की रक्षा करेंगे। सब गोप−गोपियां अपने−अपने गाय−बछड़ों,

बैलों को लेकर गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुंच गये। श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी

कनिष्ठ उंगली पर धारण कर छाता सा तान दिया। सब ब्रजवासी सात दिन तक गोवर्धन पर्वत की शरण में रहे।

सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर जल की एक बूंद भी नहीं गिरी।

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इस प्रकार होने लगी गोवर्धन पूजा

This is how Govardhan puja started
This is how Govardhan puja started

ब्रह्माजी ने इन्द्र को बताया कि पृथ्वी पर श्रीकृष्ण ने जन्म ले लिया है। उनसे तुम्हारा बैर लेना उचित नहीं है।

श्रीकृष्ण अवतार की बात जानकर इन्द्रदेव लज्जित हुए तथा भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा−याचना करने लगे।

श्रीकृष्ण ने सातवें दिन गोवर्धन पर्वत को नीचे रखकर ब्रजवासियों से कहा,

कि अब तुम प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व मनाया करो।

तभी यह यह गोवर्धन पर्व के रूप में प्रचलित हो गया।

गोवर्धन पूजा करने से पहले जान लें विधि
Know the method before worshiping Govardhan
Know the method before Govardhan puja

अगर आप भी गोवर्धन पूजा करने वाले हैं तो सबसे पहले उसकी विधि के बारे में जान लें,

अन्यथा आपका प्रयास विफल भी हो सकता है। यह वही दिन है,

जब लोग अपने घर के आंगन में गाय के गोबर से एक पर्वत बनाकर उसे जल, मौली, रोली,

चावल, फूल, दही तथा तेल का दीपक जलाकर उसकी पूजा करते हैं। इसके बाद गोबर से,

बने पर्वत की परिक्रमा की जाती है और ब्रज के देवता कहे जाने वाले गिरीराज भगवान को,

प्रसन्न करने के लिए उन्हे अन्नकूट का भोग लगाया जाता है।

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