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लक्ष्मी विवाह के इस किस्से से जुड़ा है भगवान विष्णु के मनुष्य जीवन जीने का रहस्य

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आजकल शादी व्याह का दौर बड़ा ही चल रहा है। तो हमने भी सोचा कि हमारे पाठको को धर्म से जुड़े। कुछ अनोखे और शानदार विवाह के बारे में जानकारी दी जाए। इससे पहले हमने भगवान शिव और पार्वती के विवाह की कथा सुनाई थी। तो आज इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए। हम आपके लिए vishnu vivah भगवान विष्णु और लक्ष्मी के विवाह की रोचक कथा लेकर के आए हैं। कथा के अंत में उससे जुड़े सवालो का भी जवाब दिया जाएगा। तो चलिए भगवान विष्णु और लक्ष्मी की कैसे हुई? शादी इस बारे में विस्तार से जानते हैं:

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vishnu vivah ki katha

  • विष्णु और लक्ष्मी का विवाह कैसे हुआ
  • माता लक्ष्मी विवाह स्वयंवर
  • हरि का रूप पाकर नारद ने क्या किया
  • नारद मुनि ने विष्णु के अपमान का बदला कैसे लिया
  • लक्ष्मी और विष्णु की शादी से जुड़े सवाल जवाब

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lord vishnu and lakshmi love story
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विष्णु और लक्ष्मी का विवाह कैसे हुआ

लक्ष्मी और भगवान विष्णु के विवाह की कथा शुरू करते हैं।

आप इस अलौकिक कथा को हमारे पुराने वेद और पुराणों में भी पढ़ सकते हैं।

एक बार ऋषि भृगु की पुत्री हुआ करती थी। जिसका नाम लक्ष्मी था, उनकी माता का नाम ख्याति था।

यह राजा भृगु (दक्ष के भाई) ने एक बार लक्ष्मी जी के विवाह के लिए स्वयंबर का आयोजन किया।

लक्ष्मी माता के विवाह के स्वयंवर में कई देवता और दानव भी पहुंचे चुकी।

माता लक्ष्मी विवाह स्वयंवर

माता लक्ष्मी द्वारा पहले ही अपने मन में ही भगवान विष्णु को पति के रूप मान लिया था।

लेकिन नारद मुनि जी भी लक्ष्मी जी से विवाह करना चाहते थे।

तो नारद ने सोचा कि यह तो राजकुमारी है। और उसको राजकुमारी जैसा ही रुप सुहायेगा तो नारद जी इसके बाद भगवान विष्णु के पास पहुंच गए।

उनसे हरि के समान सुंदरता देने के लिए कहा। भगवान नारद को विष्णु भगवान ने उनके कहे अनुसार हरि का रूप दे दिया।

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why narada muni wishes for hari roop
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हरि का रूप पाकर नारद ने क्या किया

नारद मुनि द्वारा भगवान विष्णु से प्राप्त हरि के अवतार को लेकर राजकुमारी के स्वयंवर के लिए चले गए।

उन्हें विश्वास था कि राजकुमारी उन्हें ही वर माला पहनाएगी।

लेकिन ऐसा हुआ नहीं राजकुमारी द्वारा नारद को छोड़कर भगवान विष्णु vishnu vivah के गले में वरमाला डाल दी।

नारद जी उस समय उदास होकर वहां से लौट गए। तो रास्ते के जलाशय में उन्होंने अपना चेहरा देखा।

उन्हें अपने चेहरे को देखा तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। क्योंकि उनका चेहरा बंदर की जैसा दिख रहा था।

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नारद मुनि ने विष्णु के अपमान का बदला कैसे लिया

अपने बंदर के रूप को देखकर नारद मुनि यह समझ गए। कि भगवान विष्णु ने उनके साथ में छल किया है।

उनको भगवान पर काफी ज्यादा गुस्सा आया। नारद सीधे इस बात को लेकर बैकुंठ पहुंच गए।

आवेश में आकर उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दे दिया। कि आपको मनुष्य रूप में जन्म लेकर पृश्वी पर जाना होगा।

जिस तरह मुझे स्त्री का वियोगसहना पड़ा है। ठीक उसी तरह आपको भी वियोग के चलते जीवित रहना होगा।

इस कारण से ही राम और सीता के रूप में जन्म लेकर विष्णु और देवी लक्ष्मी को वियोग सहना पढ़ा।

माता लक्ष्मी से शादी करने के लिए जब भगवान विष्णु बारात लेकर जा रहे थे।

तो उन्हें रस्ते में काफी सारी दिक्कत का सामना करना पड़ा।

जिसके चलते उनकी समस्याओं का निवारण भगवान श्री गणेश ने किया।

why vishnu gave monkey face to narad muni
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लक्ष्मी और विष्णु की शादी से जुड़े सवाल जवाब

भगवान विष्णु विष्णु की शादी किस परिवार में हुई थी?

दोनों ही भगवान की शादी राजा दक्ष के परिवार में हुई थी। जिनके पिता ब्रह्मा जी को बतया जाता हैं। लक्ष्मी के पिता राजा दक्ष के भाई थे।

भगवान विष्णु ने नारद को बंदर का रुप क्यों दिया?

vishnu vivah कथा के दौरान कुछ लोग सोच रहे होंगे कि भगवान विष्णु ने नारद जी के साथ छल किया। लेकिन आपको बता दें हरि का अर्थ होता है। विष्णु और विष्णु एक प्रकार का वानर हरि यानी की बंदर होता है। जिस कारण मुनि नारद के द्वारा हरि रूप मांगे जाने। पर भगवान विष्णु ने उन्हें बंदर का रूप दे दिया।

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vishnu se purva narad karna chahte the lakshmi se shadi
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हरि और लक्ष्मी के विवाह में क्या दिक्कत आई?

भगवान शिव की तरह विष्णु के विवाह में भी दिक्कते आई। जब विष्णु बारात लेकर लक्ष्मी जी के यहां जा रहे थे। तो उन्हें रस्ते में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। क्योंकि मार्ग पूरा खुदा हुआ था। यह मार्ग भगवान श्री गणेश के वाहन मूषक ने खोद दिया था। बाद में श्री गणेश को मनाने के बाद में उन्होंने मार्ग ठीक किया। और भगवान विष्णु की बारात लक्ष्मी के घर पहुंची।

क्यों लक्ष्मी माता की बारात का मार्ग गणेश के मूषक ने खुदा?

vishnu vivah अगर आपने शिव पुराण जैसी कथा पहले सुनी होगी। तो उसमें एक बात का जिक्र हुआ था। कि भगवान शंकर और गणेश के युद्ध होने के बाद। शंकर ने गणेश जी की गर्दन काटकर उन्हें हाथी की गर्दन दी। फिर माता सती ने यह सोचा की हाथी की गर्दन के चलते उनके बेटे को कोई याद नहीं रखेगा। तो ब्रहमा और विष्णु के आशीर्वाद के कारण प्रथम पूजने का दर्जा मिला। जिस कारण से विष्णु की शादी में गणेश भगवन से ना पूछने की वजह से मूषक ने रस्ते को खोद दिया। बाद में उनकी पूजा करने पर मार्ग दुरुस्त हुआ और विष्णु लक्ष्मी से शादी करने के लिए उनके घर पहुंचे।

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Prakash Panwar

मैं एक फ्रीलॉंसर हिंदी कंटेंट राइटिंग करता है. मुझे टेक्नोलॉजी, एंटरटेनमेंट, पॉलिटिक्स और एजुकेशन जैसी बिट पर लिखना पसंद करता है. खाली समय में कंप्यूटर पढ़ना बहुत अच्छा लगता है. क्वालिफिकेशन की बात की जाये तो में बी-टेक कंप्यूटर साइंस से अध्यनरत हूँ.

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